भारत की जीडीपी ग्रोथ में आई मज़बूती पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

भारत की अर्थव्यवस्था

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इमेज कैप्शन, निर्मला सीतारमण नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल से वित्त मंत्री हैं
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इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर 7.8% रही. यह पिछले साल की पहली तिमाही में दर्ज 6.9% से ज़्यादा है.

हालांकि यह इस साल जनवरी-मार्च तिमाही में दर्ज वृद्धि दर 8.6% से कम है. ये आँकड़े इसी हफ़्ते सोमवार को सरकार ने जारी किए थे.

कहा जा रहा है कि इसमें मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज़ सेक्टर की अहम भूमिका रही. पहली तिमाही में वृद्धि दर ब्लूमबर्ग के सर्वे में 7.3% के औसत अनुमान और भारतीय रिज़र्व बैंक के 7% के पूर्वानुमान से भी ज़्यादा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वृद्धि को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि तेल की क़ीमतों में झटके, सप्लाई चेन में बाधाएं और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत ने यह प्रदर्शन किया है.

भारत ऑटोमोबाइल और मोबाइल फोन से लेकर फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स और स्टील तक सब कुछ बनाता है और अब सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को भी बड़े पैमाने पर विकसित करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 17% है, जो पीएम मोदी के 25% के लक्ष्य से अब भी कम है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''जून तिमाही का प्रदर्शन एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मार्च 2027 तक के 12 महीनों में 7% से ज़्यादा की वृद्धि दर हासिल करने की राह पर भी ले जाता है.''

''यह प्रदर्शन मज़बूत है, लेकिन 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा करने के लिए भारत को इससे भी तेज़ गति से विस्तार करना होगा.''

जीडीपी में तेज़ वृद्धि के बीच भारत का चालू खाता घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बढ़कर 4.2 अरब डॉलर, यानी जीडीपी का 0.5% हो गया है. एक साल पहले इसी तिमाही में यह 3.4 अरब डॉलर, यानी जीडीपी का 0.4% था.

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इमेज कैप्शन, मोदी सरकार में वित्त सचिव रह चुके सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी के आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं

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विपक्षी दलों ने 7.8% की जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों पर संदेह जताया है.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर कहा, "बेरोज़गारी 50 साल के उच्चतम स्तर पर है. 40% युवा ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं. जुलाई 2026 में 15 से 29 साल की उम्र के हर 6 में से 1 युवा भारतीय बेरोज़गार था. हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा बिखर चुका है."

उन्होंने कहा कि खुदरा महंगाई 19 महीनों के उच्चतम स्तर पर है और चीनी, प्याज, टमाटर, दाल, खाना पकाने के तेल, चावल, दूध और रसोई में इस्तेमाल होने वाली हर जरूरी चीज़ की क़ीमतें "आग" की तरह बढ़ रही हैं.

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वित्त सचिव रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने भी जीडीपी के आँकड़ों पर सवाल उठाया है.

एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में उन्होंने कहा कि 7.8 प्रतिशत पहली नज़र में प्रभावशाली लगता है, लेकिन हमें इसकी वास्तविकता में जाना चाहिए.

गर्ग ने कहा, ''पिछले साल पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि भी 7.8 प्रतिशत थी और इस साल के लिए भी वही दावा किया जा रहा है. लेकिन पिछले साल की जीडीपी को संशोधित करके 6.9 प्रतिशत कर दिया गया था. संशोधित आँकड़ों के हिसाब से इस साल की पहली तिमाही की वृद्धि दर ऊपर दिखती है. लेकिन पूरी बात सिर्फ़ इतनी नहीं है.''

गर्ग ने कहा, ''7.8 प्रतिशत वाली जीडीपी में महंगाई के प्रभाव को हटा दिया गया है. जीडीपी की गणना वास्तव में मौजूदा क़ीमतों पर की जाती है. वे क़ीमतें जो आप और हम चुकाते हैं और जो कॉरपोरेट कंपनियां वसूलती हैं. इसलिए मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी ही जीडीपी को देखने का वास्तविक त��ीक़ा है.''

''मैं एक संख्या की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा, जिसे मुझे लगता है कि अब तक हर कोई नज़रअंदाज़ कर रहा है. पिछले साल मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी. इसे अब संशोधित करके 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है.''

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गर्ग ने कहा, ''मैं कह रहा हूँ कि पिछले साल की जीडीपी को पूरे 6 ट्रिलियन रुपये तक नीचे संशोधित करने की वजह से इस साल पहली तिमाही की जीडीपी लगभग 10.3 प्रतिशत बढ़ी हुई दिख रही है. अगर पिछले साल की जीडीपी को संशोधित नहीं किया गया होता, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत होती.''

गर्ग ने कहा, ''पिछले साल मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी, जिसे अब घटाकर 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है, ताकि इस साल की जीडीपी बेहतर दिखे. अगर पिछले साल की संख्या को संशोधित नहीं किया गया होता, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि 2.6 प्रतिशत होती.''

गर्ग का आरोप है कि भारत की जीडीपी वृद्धि को पिछले वर्ष के नॉमिनल जीडीपी बेस में की गई बड़ी गिरावट से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है.

दावे के मुताबिक, पिछले साल की पहली तिमाही में मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी को लगभग 86 ट्रिलियन रुपए से घटाकर 80 ट्रिलियन रुपए कर दिया गया. इसके परिणामस्वरूप, मौजूदा वर्ष का लगभग 88 ट्रिलियन रुपए का उत्पादन क़रीब 10.3% की वृद्धि दर्शाता हुआ दिखाई देता है, जबकि पुराने बेस के आधार पर वृद्धि लगभग 2.6% होती.

गर्ग को सरकार के आँकड़ों पर संदेह क्यों हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''पिछले साल का डेटा भी सरकार का ही था और इस साल का डेटा भी सरकार का ही है. पिछले साल इसी सरकार ने कहा था कि पहली तिमाही में मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी. इस साल उसे संशोधित करके 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है. इससे इस साल के 88 ट्रिलियन रुपये को 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दिखाया जा सकता है.

गर्ग ने कहा, ''अगर आप पिछले साल के सरकारी आंकड़ों से तुलना करें, तो केवल दो-तीन क्षेत्रों में वृद्धि हुई है- कृषि और खनन में. उन्होंने कहा पिछले साल की मौजूदा क़ीमतों वाली जीडीपी के आँकड़ों से तुलना करें तो मैन्युफैक्चरिंग वास्तव में नकारात्मक है. मेरा मानना है कि हमें अधिक गहन विश्लेषण करना चाहिए कि सरकार ने मौजूदा क़ीमतों वाली जीडीपी को इतनी भारी मात्रा में नीचे संशोधित क्यों किया.''

निर्मला सीतारमण

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इमेज कैप्शन, हर सरकारें जीडीपी वृद्धि दर को अर्थव्यवस्था की मज़बूती से जोड़ती रही है

सरकार ने बदला था आधार वर्ष

जीडीपी वृद्धि दर से भारत की अर्थव्यवस्था की मज़बूती के संबंध को लेकर सवाल अक्सर उठते रहते हैं. पिछले साल फ़रवरी में सरकार ने नई जीडीपी सिरीज़ की घोषणा की थी. इसके तहत 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया था.

27 फ़रवरी 2026 को वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के लिए जीडीपी अनुमानों और इससे जुड़े अन्य आंकड़ों की नई सिरीज़ पर एक प्रेस नोट जारी किया गया था. इसके तहत सरकार ने 2011-12 के पुराने आधार वर्ष को बदल दिया था.

आधार वर्ष उन क़ीमतों, प्रोडक्शन स्ट्रक्चर और ख़र्च के पैटर्न के लिए एक बेंचमार्क उपलब्ध कराता है, जिनका इस्तेमाल समय के साथ उत्पादन की तुलना करने के लिए किया जाता है. आधार वर्ष को अपडेट करना ज़रूरी भी माना जाता है क्योंकि अर्थव्यवस्था बदलती रहती है. भारत इससे पहले 2004–05 और 1999–2000 को आधार वर्ष के तौर पर इस्तेमाल कर चुका है. आजादी के बाद यह आठवां ऐसा संशोधन था.

ज़्यादा विकसित अर्थव्यवस्थाओं के उलट, भारत में आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में होता है. आधिकारिक टैक्स रिकॉर्ड उन छोटे कारोबारों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं देते जो परंपरागत रूप से टैक्स नहीं देते रहे हैं.

पिछले साल दिसंबर में अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने भी भारत की आधिकारिक जीडीपी वृद्धि दर की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे. उनका तर्क था कि आधिकारिक अनुमान औपचारिक क्षेत्र के संकेतकों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर करते हैं, जबकि देश की कहीं बड़ी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को पर्याप्त रूप से माप नहीं पाते.

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प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने कहा था, ''पिछले साल जुलाई–सितंबर तिमाही में 8.2% वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज की गई, जो क़रीब 18 महीनों में सबसे ज़्यादा थी. लेकिन दूसरे संकेतक कहीं कमज़ोर तस्वीर दिखा रहे थे. अक्तूबर में औद्योगिक वृद्धि सिर्फ़ 0.3% रही, बेरोज़गारी चिंता का विषय बनी रही, निवेश की कई परियोजनाएं कथित तौर पर अटक गईं या वापस ले ली गईं और नेट एफ़डीओ नकारात्मक हो गया.''

अरुण कुमार का तर्क था कि ऐसे विरोधाभासों को जीडीपी के आंकड़ों की जांच का कारण बनना चाहिए, न कि आधिकारिक वृद्धि दर को बिना सवाल के स्वीकार कर लेना चाहिए.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार की मुख्य आलोचना यह है कि भारत के क़रीब 94% कर्मचारी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जबकि तिमाही उत्पादन का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई नियमित संकेतक जैसे विमान यातायात, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री और माल ढुलाई मुख्य रूप से औपचारिक गतिविधियों को दर्शाते हैं.

उनका तर्क है कि अगर औपचारिक क्षेत्र बढ़ रहा हो, जबकि छोटी कंपनियां, अनौपचारिक कारोबारी और स्वरोजगार करने वाले लोग ��र्थिक दबाव में हों, तो औपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों के आधार पर अनौपचारिक क्षेत्र की वृद्धि का अनुमान लगाने से पूरी अर्थव्यवस्था के मज़बूत विस्तार की ग़लत तस्वीर सामने आ सकती है.

प्रोफ़ेसर कुमार मानते हैं कि भारत की जीडीपी शायद औपचारिक और कॉरपोरेट-केंद्रित अर्थव्यवस्था को रोज़गार पर निर्भर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की तुलना में ज़्यादा प्रभावी तरीके से माप रही है.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का कहना है कि जीडीपी के आंकड़ों को बेहतर बनाने के लिए कई बदलाव ज़रूरी हैं. इनमें नया आधार वर्ष, जनगणना के आधार पर अपडेट किए गए सैंपल, अनौपचारिक क्षेत्र के बेहतर सर्वे और आंकड़े जुटाने के बेहतर तरीके शामिल हैं. साथ ही, क़ीमतों को मापने की व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए और तिमाही व सालाना जीडीपी के आंकड़ों के बीच तालमेल भी ज्यादा पारदर्शी होना चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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